सारनाथ का ऐतिहासिक एवं पुरातात्त्विक अध्ययन: ऋषिपत्तन से बौद्ध तीर्थस्थल तक

Title

A Historical and Archaeological Study of Sarnath: From Rishipattana to a Buddhist Pilgrimage Site

Eastern Scientist | www.easternscientist.in
Print ISSN: 2581-7884 | ISSN-L: 2581-7884 | Volume III | Issue 36 | July–September 2026
REVIEW ARTICLE
नीतू कुमारी1
1प्राचीन भारतीय इतिहास एवं पुरातत्व विभाग, पटना विश्वविद्यालय, पटना
*Corresponding Author:डॉ.नीतू कुमारी | Email:neetukri1984@gmail.com
DOI :

Abstract

Sarnath was previously a dense forest where deer used to roam. At that time, it was known as 'Rishipattan' and 'Mrigadav'. After attaining enlightenment, Gautam Buddha delivered his first sermon here. During the reign of Emperor Ashoka, significant construction work took place at this site. The national emblem of India, featuring the lion capital, was adopted from the top of the Ashoka Pillar at Sarnath. The 'Dhamek Stupa' located here continues to reflect the antiquity of Sarnath to this day. Over time, due to foreign invasions and mutual religious conflicts, the significance of Sarnath declined. The place came to be called Sarnath due to the presence of the Sarangnath Mahadev Temple in Rishipattan. Its ancient name was Rishipattan (Isipatana or Mrigadav, meaning 'Deer Park'). The term Rishipattan literally means 'the fall of a sage', referring to the place where a previous Buddha attained Nirvana upon realizing the future enlightenment of Gautam Buddha.

Keywords: Sarnath, Rishipattan, Mrigadav, Gautam Buddha, Bodhisattva

सारांश

सारनाथ में पहले घना वन था और मृग-विहार किया करते थे। उस समय इसका नाम 'ऋषिपत्तन' और 'मृगदाव' था। ज्ञान प्राप्त करने के बाद गौतम बुद्ध ने अपना प्रथम उपदेश यहीं पर दिया था। सम्राट अशोक के समय में यहाँ बहुत से निर्माण कार्य हुए। सिंहों की मूर्ति वाला भारत का राजचिह्न सारनाथ के अशोक के स्तंभ के शीर्ष से ही लिया गया है। यहाँ का 'धामेक स्तूप' सारनाथ की प्राचीनता का आज भी बोध कराता है। विदेशी आक्रमणों और परस्पर की धार्मिक खींचातानी के कारण आगे चलकर सारनाथ का महत्व कम हो गया था। ऋषिपत्तन में सारंगनाथ महादेव मन्दिर होने के कारण इस स्थान का नाम सारनाथ पड़ा। इसका प्राचीन नाम ऋषिपत्तन (इसिपतन या मृगदाव) (हिरनों का जंगल) था। ऋषिपत्तन से तात्पर्य 'ऋषि का पतन' से है जिसका आशय है वह स्थान जहाँ किसी एक बुद्ध ने गौतम बुद्ध भावी संबोधि को जानकर निर्वाण प्राप्त किया था।

Keywords:सारनाथ, ऋषिपत्तन, मृगदाव, गौतम बुद्ध, बोधिसत्व

शोधपत्र

सारनाथ वर्तमान में काशी या वाराणसी जनपद में अवस्थित है। यह स्थान वाराणसी रेलवे से पूर्व दिशा की ओर लगभग 10 किलोमीटर है। ज्ञान प्राप्ति के पश्चात् भगवान बुद्ध ने अपना प्रथम उपदेश यहीं दिया था जिसे 'धर्मचक्रप्रवर्तन' का नाम दिया जाता है (लगभग 533 ईसा पूर्व) सारनाथ में अशोक का चतुर्मुख सिंह स्तम्भ विद्यमान है। भारत का राष्ट्रीय चिन्ह इसी अशोक स्तम्भ के मुकुट की द्वितीय अनुकृति से लिया गया है।

सारनाथ में पहले घना वन था और मृग-विहार किया करते थे। उस समय इसका नाम 'ऋषिपत्तन' और 'मृगदाव' था। ज्ञान प्राप्त करने के बाद गौतम बुद्ध ने अपना प्रथम उपदेश यहीं पर दिया था। सम्राट अशोक के समय में यहाँ बहुत से निर्माण कार्य हुए। सिंहों की मूर्ति वाला भारत का राजचिह्न सारनाथ के अशोक के स्तंभ के शीर्ष से ही लिया गया है। यहाँ का 'धामेक स्तूप' सारनाथ की प्राचीनता का आज भी बोध कराता है। विदेशी आक्रमणों और परस्पर की धार्मिक खींचातानी के कारण आगे चलकर सारनाथ का महत्व कम हो गया था।

ऋषिपत्तन में सारंगनाथ महादेव मन्दिर होने के कारण इस स्थान का नाम सारनाथ पड़ा। इसका प्राचीन नाम ऋषिपत्तन (इसिपतन या मृगदाव) (हिरनों का जंगल) था। ऋषिपत्तन से तात्पर्य 'ऋषि का पतन' से है जिसका आशय है वह स्थान जहाँ किसी एक बुद्ध ने गौतम बुद्ध भावी संबोधि को जानकर निर्वाण प्राप्त किया था। मृगों के विचरण करने वाले स्थान के आधार पर इसका नाम मृगदाव पड़ा, जिसका वर्णन निग्रोधमृग जातक में भी आया है। आधुनिक नाम 'सारनाथ' की उत्पत्ति 'सारंगनाथ' (मृगों के नाथ) अर्थात् गौतम बुद्ध से हुई। जिसका संबंध बोधिसत्व की एक कथा से भी जोड़ा जाता है। बोधिसत्व ने अपने किसी पूर्वजन्म में, जब वे मृगदाव में मृगों के राजा थे, अपने प्राणों की बलि देकर एक गर्भवती हरिणी की जान बचाई थी। इसी कारण इस वन को सारंग (मृग)- नाथ या सार-नाथ कहने लगे।

दयाराम साहनी के अनुसार शिव को भी पौराणिक साहित्य में सारंगनाथ कहा गया है और महादेव शिव की नगरी काशी की समीपता के कारण यह स्थान शिवोपासना की भी स्थली बन गया। इस तथ्य की पुष्टि सारनाथ में, सारनाथ नामक शिवमंदिर की वर्तमानता से होती है।

भारत में स्थित बौद्ध तीर्थ स्थलों में सारनाथ का वही महत्व है जो स्थान मुसलमानों के लिए मक्का-मदीना का और सिक्ख धर्मावलम्बियों के लिए स्वर्ण मन्दिर का। सारनाथ वाराणसी से लगभग 7 किमी० दूर स्थित है। महात्मा बुद्ध ने 588 ई०पू० में आषाढ़ पूर्णिमा1 के दिन यहीं पर उन पांच भिक्षुओं को अपना प्रथम उपदेश दिया था। जिसे बौद्ध साहित्य में धर्मचक्रप्रवर्तन कहा जाता है।2 बौद्ध ग्रन्थ 'ललितविस्तर' एवं सयुक्त निकाय में सारनाथ को इसिपत्तन मृगदाव' के नाम से सम्बोधित किया गया है।3 बुद्ध के महापरिनिर्वाण के करीब 300 वर्ष पश्चात सम्राट अशोक के बुद्ध से सम्बन्धित घटना स्थलों को चिर-स्थायी रूप प्रदान करने की दृष्टि से उन पर भव्य स्मारकों का निर्माण करवाया तथा बौद्ध धर्म को अपना राजाश्रय एवं संरक्षण प्रदान किया। इस सन्दर्भ में सम्राट अशोक ने सारनाथ में भी स्तूप एवं सिंह स्तम्भ को स्थापित करवाया। सारनाथ में जहां भगवान बुद्ध ने पंचवर्गीय भिक्षुओं का आदर सत्कार किया था उस स्थल पर सम्राट अशोक ने 'चौखण्डी स्तूप' का निर्माण करवाया था और जहां पर प्रथम उपदेश दिया था वहां पर 'धर्मराजिका स्तूप' का निर्माण करवाया था।4 सारनाथ से प्राप्त उत्खनन का विवरण अग्रलिखित है।

स्तूप

सारनाथ भगवान बुद्ध से सम्बन्धित था इसीलिए सम्राट अशोक ने अन्य तीर्थ स्थलों की तरह सारनाथ में भी अनेकों स्तूपों एवं विहारों का निर्माण करवाया था। वर्तमान में अशोक द्वारा बनवाये गये तीन स्तूपों के अवशेष यहां मिलते हैं जिसका विवरण अग्रलिखित है।

धमेख स्तूप

सर्वप्रथम अलेक्जेण्डर कनिंघम द्वारा सारनाथ उत्खनन कार्य करवाया गया था। यहां घने जंगलों के बीच धमेख स्तूप प्राप्त हुआ। यह स्तूप ठोस गोलाकार बुर्ज की भाँति है जिसका व्यास 28.35 मीटर तथा ऊँचाई 39 मी० है। यह स्तूप सम्पूर्ण अवस्था में स्थित है। स्तूप के चारों ओर समान दूरी पर आठ आले हैं जिसमें पहले बुद्ध मूर्तियां रखी हुयी थी। आज भी उनके आसन परिलक्षित होते हैं। उत्खनन में ऐसी मूर्तियाँ पायी गयी हैं जो आसन रहित हैं।5 स्तूप का निचला भाग सुन्दर खुदे प्रस्तरों से आच्छादित हैं तथा ऊपरी भाग ईट का बना है। यह स्तूप उस स्थान पर बना है जहां बुद्ध ने प्रथम धर्मचक्रप्रवर्तन किया था। यद्यपि इस स्तूप से धातु अवशेष अब तक प्राप्त नहीं हुए हैं किन्तु छठीं और सातवीं की लिपि में अंकित एक लेख शीर्ष भाग के तीन फुट नीचे प्राप्त हुआ था जिसमें यह गाथा उल्लिखित हैं- "ये धम्मा हेतुप्पभवा, हेतुतेसं तथागतो आह। तेसं च यो निरोधो, एवंवादी महासमनो।।" अभिलेख से यह भी स्पष्ट है कि चौथी से सातवीं सदी तक सारनाथ सर्वास्तवादी भिक्षुओं की प्रमुखता थी।6

धर्मराजिका स्तूप

यह स्तूप भी सम्राट अशोक द्वारा बनवाया गया था। इस स्तूप का केवल निचला स्तर अर्थात केवल नींव ही बचा हुआ है। इस स्तूप में भगवान बुद्ध के अस्थि कलश विद्यमान थे। इतिहासकारों का मानना है कि इस स्तूप की मरम्मत कुषाण काल में हुआ था।7 पाल वंश के शासक महीपाल ने भी इसका जीर्णोद्धार कराया था।8 सारनाथ में बोधिसत्व की दो प्रसिद्ध मूर्तियां है। एक मूर्ति कनिष्क के द्वारा बनवाया गया था एवं दूसरी विश्व प्रसिद्ध मूर्ति धर्मचक्रप्रवर्तन मुद्रा में है जो गुप्तकालीन है।9

चौखण्डी स्तूप

यह स्तूप सारनाथ से दक्षिण-पश्चिम दिशा में स्थित है। पुरातत्ववेत्ताओं का मानना है कि यह स्तूप किसी समय बडा स्तूप था किन्तु अब अठकोने घर के साथ 84 फूट ऊँचा है।10

विहार

बौद्ध विहारों का निर्माण भिक्षुओं के निवास के लिए कराया जाता था। तत्कालीन समय में सम्भवतः यहां भिक्षुओं के लिए पर्ण कुटियां थी जिनमें पंचवर्गीय भिक्षु निवास करते थे।11 'धम्मपदअट्ठकथा' 12 एवं 'सुत्तनिपात अट्ठकथा' 13 में वर्णन मिलता है कि सारनाथ में विहार का निर्माण दायकों द्वारा करवाया गया था। सारनाथ में बौद्ध धर्म के प्रचार के साथ यहां भिक्षुओं की संख्या में वृद्धि होती गयी तथा बौद्ध धर्म को राजाश्रय भी प्राप्त होने लगा फलतः विभिन्न स्थलों पर विहारों के निर्माण में भी वृद्धि हुयी। चूंकि सारनाथ में बुद्ध के समय से ही भिक्षु निवास करते थे अतः उनके निवास की यहां व्यवस्था की गयी होगी। कालान्तर में इन विहारों को अधिक मजबूत और टिकाऊ स्वरूप प्रदान किया गया होगा। मौर्यकाल में यहां विहार बनने का कोई उल्लेख नहीं मिलता किन्तु उस समय के श्रद्धालुओं द्वारा सारनाथ में विहार, संघाराम बनाने का उल्लेख महावंश में मिलता है। सारनाथ उत्खनन से अभी तक सात विहार प्रकाश में आये हैं जो अग्रलिखित हैं-

विहार संख्या प्रथम

कन्नौज की महारानी कुमार देवी (गहड़वाल राजा गोविन्दचन्द्र की पत्नी) ने धर्मचक्र जिन विहार का निर्माण करवाया था। इस विहार से नारी मूर्तियां मिली हैं। विहार के प्रांगण में कुआं होने के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। इसके अतिरिक्त उनके चीवर रखने के खम्भे भी प्राप्त हुए हैं।14

विहार संख्या द्वितीय

यह विहार संख्या प्रथम के पश्चिमोत्तर दिशा पर स्थित है इसके मध्य में बड़ा प्रांगण है। इसमें 9 बड़े कोठरी के प्रमाण प्राप्त हुए हैं। इसके अतिरिक्त यहां पर कुआं भी प्राप्त हुए हैं।15

विहार संख्या तृतीय

यह विहार धर्मचक्र जिन विहार के ठीक पूरब दिशा में स्थित था। इसमें दक्षिण एवं पश्चिम की ओर कोठरियों के अवशेष प्राप्त हुए हैं।16

विहार संख्या चतुर्थ

यह विहार संख्या तृतीय के दक्षिण-पूर्व एवं द्वितीय प्रांगण के मध्य स्थित था। दोनों प्रवेश द्वारों के मध्य चतुर्थ विहार स्थित था। इसमें उत्तर पूर्व की ओर तीन-तीन कोठरियां होने के अवशेष विद्यमान हैं।

विहार संख्या पंचम

इस प्रांगण के चारों ओर 82 फीट लम्बी एवं 8 फीट चौड़ी कोठरियां भिक्षु संघ के लिए बनी थी, एक कुआं भी भिक्षुओं के उपयोग के लिए था। यह विहार मूलगंधकुटी विहार से सम्बन्धित था।17

विहार संख्या षष्ठम

धमेख स्तूप के पास पश्चिम दिशा में यह विहार स्थित था। किट्टो के द्वारा इस विहार का उत्खनन कार्य प्रारम्भ कराया गया था तथा इस विहार को औषधालय बताया गया है क्योंकि कुछ औषधि कूटने के पात्र प्राप्त हुए हैं।

विहार संख्या सप्तम

- यह विहार पंचम विहार के पश्चिम और धर्मराजिका स्तूप से दक्षिण दिशा में स्थित था। इसमें विशाल प्रांगण के अतिरिक्त कुआं का साक्ष्य प्राप्त हुआ है।

मूलगंध कुटी विहार

बुद्ध ने सारनाथ में पंचवर्गीय भिक्षुओं को अपना प्रथम उपदेश देने के उपरान्त जिस स्थान पर स्वयं निवास किया उस स्थान को ही 'मूलगन्धकुटी विहार' कहा जाता है।18

संदर्भ

  1. सारनाथ का इतिहास, भिक्षुधर्म रक्षित, पृ०-1
  2. ललित विस्तर पृ०-1
  3. संयुक्त निकाय, खण्ड-4, पृ०-144
  4. सारनाथ का इतिहास, शांति स्वरूप बौद्ध, पृ० - 68
  5. सारनाथ का इतिहास, दया राम साहनी, पृ०-5-9
  6. बौद्ध महातीर्थ, मदन मोहन नागर, पृ०-27
  7. स्टडीज इन अर्ली बुद्धिस्ट आर्किटेक्चर ऑफ इण्डिया, एच० सरकार, पृ०-58
  8. सारनाथ का इतिहास, दया राम साहनी, पृ०-88
  9. वही, पृ०-64
  10. ह्वेनसांग की भारत यात्रा, ठाकुर प्रसाद शर्मा, पृ०-333 11. भारतीय कला की भूमिका, भगवती शरण उपाध्याय, पृ०-24
  11. धम्मपदअट्ठकथा, 169
  12. सुत्तनिपातअट्ठकथा, 1-3
  13. सारनाथ का इतिहास, दया राम साहनी, पृ0-182
  14. सारनाथ का इतिहास, भिक्षु धर्मरक्षित, पृ०-191
  15. सारनाथ का इतिहास, वासुदेव शरण अग्रवाल, पृ०-7
  16. ए गाइड टू सारनाथ, बी० मजुमदार, पृ०-39
  17. सारनाथ का इतिहास, शांति स्वरूप बौद्ध, पृ०-67

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